महाविद्यालय का परिचय

       सूरजपुर महाविद्यालय की स्थापना नागरिको के लम्बे संघर्ष के बाद परिणाम स्वरुप सत्र १९८८- ८५ में तात्कालिक उच्च शिक्षा मंत्री भॅवर सिंह पोर्ट के द्वारा खोलने की घोषणा की गई थी। प्रारम्भ में सिमित संसाधनो के मध्य नगर पालिका से लगे नेहरू बल सदन के छोटे से भवन व् नगर पालिका के सामुदायिक हाल में महाविद्यालय की शुरूवात की गई . जन सहयोग से फर्नीचर पंखा एवं अन्य आवश्यक संसाधन जूता कर कला एवं वाणिज्य संकाय के प्रथम वर्ष की कक्षाएँ शुरू की गई और बाद में नगर पालिका के द्वारा आवश्यकता पड़ने पर दो अतिरिक्त कमरे महाविद्यालय को प्रदान किये गए , जिसमे बी. ए. एवं बी. कॉम अंतिम की कक्षाये शरू शुरू हो सकी। सात वर्षो के बाद १७ सितम्बर सत्र १९९१ में तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री सुन्दरलाल पटवा ने २६.५ एकड़ भू-खंड के साथ महाविद्यालय को स्वयं के भवन की सौगात दी भवन मिल जाने से छात्र / छात्राओ को उच्च शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण मिला, समय के साथ-साथ महाविद्या- लया में नियमित प्रवेशित छात्र / छात्राओ की संख्या लगातार बढ़ती गई उल्लेखनिय है कि अविभाजित मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी तहसील होने का गौरव प्राप्त करने वाले आज के जिला मुख्यालय सूरजपुर के महाविद्यालय को शासन के महाविद्यालय को शासन के द्वारा जिले का अग्रहणी महाविद्यालय का दर्ज दिया गया है। शासकीय महाविद्यालय सूरजपुर प्रारम्भ में गुरूघासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर से सम्बद्ध है। महाविद्यालय का भवन सूरजपुर के गुरूघासीदास वार्ड क्रमांक ०९ में स्थित है। महाविद्यालय का नाम परिवर्तित कर वर्तमान में संशोधित नामकरण पूर्व विधायक पं. रेवतीरमण मिश्र के नाम से रखा गया है


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